Friday, October 15, 2010

दशहरा की आप सब को शुभकामनाये ♥



बेवफा मुझसे तेरे ख़त जलाये नहीं जाते *



कुछ लोग ऐसे है जो भुलाये नहीं जाते..
कुछ लम्हे है जो दिल से मिटाए नहीं जाते..
बेबसी उतर आयी है आँखों में मेरी..
मेरी हँसी से मेरे आंसू छुपाये नहीं जाते..
वफ़ा की राहों में बुझने के बाद ये जाना है..
आंधियो में दीये मोहब्बत के सजाये नहीं जाते..
तेरी तहरीरो से आती है तेरे होठों की महक...
बेवफा मुझसे तेरे ख़त जलाये नहीं जाते..

Wednesday, October 13, 2010

► जमीन ना बन सका मैँ आसमान ना बन पाया ◄



जमीन ना बन सका मैँ आसमान ना बन पाया..
तेरे हालात पे भी मेहरबान ना बन पाया..
वो मेरी गुजरी हुई जिन्दगी से वाकिफ था..
कोई रिश्ता हमारे दरमियान ना बन पाया..
इस कदर साथ मेरा उनको दुशवार लगा..
लाख कोशिश की मगर कारवां ना बन पाया..
सी लिया होठोँ को मगर फिर भी जुबां खुल ही गयी..
वो सितम देख के मै भी बे जुबाँ ना बन पाया..
जो भी मुझको मिला बस मैनें उसी को चाहा..
कोई किस्सा मेरे तर्ज ऐ बयाँ ना बन पाया..।

Wednesday, September 29, 2010

कोई दीवाना कहता है - कुमार विश्वास

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है..
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है..
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है..
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है..

मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी है..
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है..
यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं..
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है..

समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता..
यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता..
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले..
जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता..

भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा..
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा..
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का..
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा..

बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेडे सह नहीं पाया..
हवाओं के इशारों पर मगर मै बह नहीं पाया..
अधूरा अनसुना ही रह गया ये प्यार का किस्सा..
कभी तू सुन नहीं पाई कभी मै कह नहीं पाया..

Friday, September 24, 2010

कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ ♥


"कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ या दिल का सारा प्यार लिखूँ ..

कुछ
अपने जज़्बात लिखू या सपनो की सौगात लिखूँ ..

मैं
खिलता सूरज आज लिखू या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ ..

वो
डूबते सूरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ..

वो
पल में बीते साल लिखू या सदियों लम्बी रात लिखूँ..

सागर
सा गहरा हो जाऊ या अम्बर का विस्तार लिखूँ..

मैं
तुमको अपने पास लिखू या दूरी का एहसास लिखूँ..

मै
अंधे के दिन मै झाँकू या आँखों की मै रात लिखूँ..

वो
पहली पहली प्यास लिखू या निश्छल पहला प्यार लिखूँ..

सावन
की बारिश में भीगूँ या आँखों की बरसात लिखूँ..

मै
हिन्दू मुस्लिम हो जाॐ या बेबस इंसान लिखूँ..

मै
एक ही मजहब को जी लूँ या मजहब की आंखे चार लिखूँ..

कुछ
जीत लिखू या हार लिखूँ या दिल का सारा प्यार लिखूँ ॥"

-
दिव्य प्रकाश दुबे